सतिगुरु जी के हुक्म के अनुसार सत्संग मर्यादा का संगत में सख़्ती से अनुपालन हो।

क्योंकि हर कोई अपने पाँच अवगुणों से लड़ रहा है।

 

सतिनाम सत्संग मर्यादा

 

धन्य धन्य सति पारब्रह्म महाराज जी सति (अनादि सत्य) पारब्रह्म परमेश्वर जी की असीम कृपा से समस्त दरगाह, समस्त संतों, भक्तों, ब्रह्मज्ञानियों, सतिगुरुओं, गुरमुखों, ख़ालसों की कृपा से, हम सति (शाश्वत सत्य पारब्रह्म परमेश्वर) की इस प्रकार से सेवा करने के लिए कि जिसके साथ समस्त सतिनाम परिवार तथा नए सत्संगियों एवं जो संगत में जुड़ने हेतु महत्वाकांक्षी हैं या जो संगत में जुड़ने के लिए सौभाग्य से पूर्वनिर्दिष्ट हैं, उन सब को सहयोग प्राप्त हो; हम कुछ बुनियादी कानून निर्धारित करना चाहते हैं जिसे हम आज से ‘सतिनाम सत्संग मर्यादा’ के नाम से जानेंगे।

 

हम नीचे लिखी ‘सतिनाम सत्संग मर्यादा’ आप सब के लिए ग़ौर करने एवं विचार करने के लिए प्रस्तावित करते हैं और आप हमें इसकी स्वीकार्यता के बारे में भी बताएँ।

 

आप सब में से कई सुहागनें हैं और अच्छी आत्मिक अवस्था के साथ प्रफुल्लित हैं तथा कभी-कभी संगत में बैठे-बैठे आप दूसरों की मदद अच्छी भावनाओं के साथ करने का यत्न करते हैं, परंतु इस कार्य में कभी-कभी आप अपना अमृत खो देते हैं और जिस व्यक्ति की आप मदद कर रहे होते हैं उसकी अत्यधिक नकारात्मक शक्तियों के कारण शुष्क पड़ जाते हैं। सो कृप्या दूसरों की मदद तब ही करें जब सतिगुरु जी आप को ऐसा करने को कहें। उदाहरण हैं: अपना हाथ किसी के सिर पर या पीठ इत्यादि पर उसकी मदद की भावना से रखना।

 

मौलिक बात यह है कि स्वयं को किसी नकारात्मक शक्ति का अपनी देह में प्रवेश होने से बचाना। जब तक आप पूर्ण अवस्था में नहीं पहुँच जाते तब तक आपकी प्रणाली में फिर भी छेद होंगे जो आपकी प्रणाली में नकारात्मक शक्तियों के प्रवेश का मार्ग बने रहेंगे।

सो जब कोई संगत में आपको नकारात्मक शक्तियों से भरा हुआ नज़र आए तो उसे सतिगुरु को संभालने दें, या जिसे सतिगुरु संभालने को कहें उसे नियंत्रित करने दें।

 

आपकी प्रणाली में नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करने का दूसरा स्रोत है जब आपकी देह किसी अन्य की देह के प्रसार में प्रवेश करती है। यह तब घटित होता है जब आप किसी को आलिंगन करते हैं या कोई आप को आलिंगन करता है, अमृत गंवाने से बचने का सब से बढ़िया तरीका है कि किसी अन्य की देह के प्रसार में प्रवेश करने से बचना। सो कृप्या संगत में दूसरों को आलिंगन करने या गले मिलने से बचें।

 

अगला मुद्दा जिस पर हम ज़ोर देना चाहते हैं वह है पुरुष संगत सदस्यों एवं महिला संगत सदस्यों का आलिंगन करना या गले मिलना। यह हमारे ध्यान में कुछ संगत सदस्यों द्वारा लाया गया है। जो नए सदस्य संगत में पहली बार आते हैं और वे अभिलाषी जो संगत में जुड़ना चाहते हैं या फिर वर्तमान संगत सदस्यों के परिवारजनों के लिए यह गलतफ़हमी का स्रोत बन जाता है।

 

एक दूसरे के गले मिलने से बचें, और विशेषकर पुरुष एवं महिला संगत सदस्यों का आलिंगन चर्चा या विवाद का विषय बन सकता है।

 

सभी संगत सदस्य एक दूसरे को दंडवत प्रणाम कर सकते हैं, जो कि यथार्थ में आपके अहंकार या अहम् को मिटाने के लिए एक अति उपयोगी शस्त्र है। इसके इलावा आप को स्वयं पर जोड़ों या जूतों की सेवा या लंगर की सेवा करने पर ज़ोर देना चाहिए, यह आपके लिए बहुत लाभदायक होगा।

सभी पुरुष सदस्य सतिगुरुओं का आलिंगन कर सकते हैं और सभी महिला सदस्य माता जी के साथ आलिंगन कर सकती हैं।

 

सभी पुरुष एवं महिला सदस्य सतिगुरुओं की प्रसन्नता के अनुसार उनसे कृपा प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

 

सभी पुरुष एवं महिला सदस्य सतिगुरुओं एवं माता जी की प्रसन्नता के अनुसार उन के साथ वार्तालाप कर सकते हैं।

कई बार आप में से कईओं को आपके पिछ्ले जन्मों के संबंधों के बारे में, सतिगुरुओं के साथ पिछ्ले जन्मों के संबंधों के बारे में और अन्य संगत सदस्यों के साथ पिछ्ले जन्मों के संबंधों के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है, कई बार हम भी आपको इन संबंधों के बारे में बताते हैं, क्योंकि हम सभी पिछ्ले जन्मों से संबंधित हैं सो यह साक्षात् है और आपकी बंदगी का भाग है कि आपको यह ज्ञान प्राप्त हुआ।

 

ये संबंध जो आप को दर्शाए जाते हैं वे पति और पत्नि, माता-पिता, भाई-बहन और इसी तरह से भिन्न-भिन्न होते हैं। आप में से कई इस बात पर चिंतित हो जाते हैं और इस पर सोचने लगते हैं तथा दूसरों के साथ अपने संबंधों के इस ज्ञान को गलत संदर्भ में ले जाते हैं।

 

सो अगर आप पिछ्ले जन्मों के संबंधों के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं तो इसका अभिप्राय यह नहीं कि आप ऐसा सोचना या करना शुरु कर दें और दूसरे के मोह में पड़ जाएं।

 

अगर आप ऐसा करेंगे तो यह एक भारी भूल है और गलत है, वास्तविक संबंध सतिनाम का संबंध है, हम सभी सतिनाम परिवार हैं, हम सभी एक दूसरे के सतिनाम में भाई, बहन, माता, पिता, बंधु, पुत्र-पुत्रियाँ हैं।

 

केवल आपका इस जन्म का जीवनसाथी (पति/पत्नी) ही आपका पति या पत्नी है, अन्य कोई नहीं। सो कृप्या इसे अपने मन में रखें और गलती से किया जा रहा या आपको उत्तेजित करने पर किया जा रहा गलत अनुकरण बंद करें।

 

जब भी आपको संदेह हो कृप्या पूछें और कुछ भी छिपाने की कोशिश न करें, क्योंकि छिपाना बुरा है और बताना एवं संदेह दूर करना आप के लिए अच्छा है।

 

जैसे कि आप में से कई हमें सब कुछ बताते हैं चाहे वे आपके निजी जीवन के राज़ हों और हम वह सुनते हैं एवं आपको अपने जीवन के सदमे से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं तथा आपको सही मार्ग पर लाने का यत्न करते हैं। हम ऐसा आगे भी करते रहेंगे, और यह एक वादा है तथा आप में से कईओं ने यह देखा है कि आपके जीवन को सही दिशा में लाने के लिए आपकी किस प्रकार से सहायता की जाती है। सो कृप्या हमें कुछ बताने में संकोच न करें, कुछ भी बताने से डरें नहीं। हम यहाँ पर केवल आपकी सहायता के लिए और आपको सही मार्ग बताने एवं सत्य के मार्ग पर लाने के लिए ही हैं। और आपने कई बार देखा है कि यदि आप कुछ छिपाने का यत्न करते हैं तो सत्य फिर भी आपके सतिगुरुओं के आगे प्रकट हो ही जाता है।

 

सतिगुरुओं के चरण स्पर्श करना बहुत कल्याणकारी है जब आप दंडवत करते हैं और आप सब यह स्वतंत्रता से कर सकते हैं। यद्यपि चरणों का नीचे वाला भाग एवं टाँगों का परिमार्जन (मालिश करना) करना तथा दबाना भक्त के लिए ज्यादा लाभकारी नहीं होता, सो हमें यह कम से कम करने का यत्न करना चाहिए।

 

महिला सदस्यों द्वारा पुरुष सतिगुरु जी के चरण एवं टाँगों को दबाना कुछ लोगों के मन में शंका लेकर आएगा सो हमें यह करने से बचना चाहिए। तथापि महिला सदस्य माता जी के साथ ऐसा कर सकती हैं।

 

यह एक भ्रम है कि ज्यादा पैर दबाने एवं मालिश करने से आपको आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होगा, वास्तव में जैसा आपको (सतिगुरु जी के द्वारा) कहा जाता है वैसा करने से आपको आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होगा।

 

सतिगुरु जानते हैं कि आपकी सहायता कब करनी है और कैसे करनी है, और वह आवश्यकता के अनुसार आपकी सहायता करता है। संगत में सिमरन और समर्पण आपकी सब से ज्यादा सहायता करेगा।

 

जब आपको ज़रूरत होगी तब सतिगुरु आपको आलिंगन करेंगे।

 

संगत अब ऑनलाईन है और पुरुष एवं महिला सदस्यों के फोन पर या ककाओ ऐप (KAKAO APP) पर निजी चैट को भी इसी प्रकार से लिया जाएगा क्योंकि अगर आप किसी पर आकर्षित हों तो सतिनाम के नाम पर परंतु अंदर से मोह में किसी के साथ चैट करना सरल हो सकता है।

 

सुदूरवर्ती संगत सतिगुरु जी और माता जी को अपनी सुरति (ध्यान) में या अपने आत्मिक झलकों (Visions) में आलिंगन एवं दंडवत कर सकते हैं।

 

इसके लिए जब भी आप को किसी संत या सतिगुरु के दर्शन होते हैं तो आप सब को उन्हें दंडवत करना चाहिए।

 

हमें इस मर्यादा की हर समय हर माध्यम से समीक्षा करते रहना चाहिए।

 

 

यदि सतिगुरु जी महिला सदस्यों को आलिंगन करने देते हैं तो वे ऐसा कर सकती हैं परंतु सतिगुरु जी का हाथ उनके प्रेम में सदा उनके सिर पर होगा।

 

यह मर्यादा आप के मित्रों के लिए नहीं है, यह संगत के लिए है।

 

यदि कोई आता है और आपको आलिंगन करता है, तो आप मर्यादा का अनुसरण करें और बाकि सतिनाम जी पर छोड़ दें।

 

यह सब संगत की सहायता के लिए और जो नए अभिलाषी संगत में आने का यत्न कर रहें हैं उनकी सहायता के लिए है न कि आप को किसी प्रकार की ठेस पहुँचाने के लिए है।

 

केवल सतिगुरु के चरणों को धोने से पानी चरण-अमृत बनता है और इसे पीने से संगत को लाभ पहुँचता है। संगत के चरण धोने से केवल उनके दु:ख पानी में आ जाते हैं और उस पानी को पीने से दूसरों को लाभ नहीं होता है। सो केवल सतिगुरु के सति चरण ही धोएँ और उस चरण-अमृत को पीएँ।

 

कुल मिलाकर सरल मार्गदर्शन है कि केवल दंडवत करते समय सतिगुरु जी के चरण स्पर्श की छूट पर; विपरीत लिंग को छूने से बचना। महिलाओं द्वारा माता जी का आलिंगन करना और सतिगुरु जी का आलिंगन पुरुषों द्वारा करना सही है। एक दूसरे को दंडवत कर अभिवादन करें और उन के चरणों की धूल को प्राप्त करने के लिए जोड़ों (जूतों) की सेवा करें।

 

  • सतिगुरु दासन दास जी

 

सतिनाम सतिनाम सतिनाम दासन दास जी, यदि आप कहेंगे कि सब का आलिंगन करो तो हम करेंगे, यदि आप कहेंगे कि किसी का आलिंगन न करो तो हम वैसा करेंगे। आप जो भी कहेंगे हम करेंगे, आप विशाल चित्र देखते हैं और हमारे पास अल्प ज्ञान है। मेरी मत थोड़ी राम॥ आप की कृपा से हम यह सोचते हैं कि मर्यादा संगत में पिछ्ले साल हुईं अनेक समस्याओं की रोकथाम करेगी और यह सब के लिए सरल है कि सेवा और सिमरन में केन्द्रित किया जाए न कि पुरुष/महिला वाद-विषय पर।

 

धन्य धन्य मेरा सतिगुरु पूरा धन्य धन्य मेरा सतिगुरु पूरा धन्य धन्य मेरा सतिगुरु पूरा

 

  • संत प्रीतम आनंद जी

 

 

इसके साथ ही एक अवस्था आती है जब हम प्रेम से भरपूर हो जाते हैं कि हमारे भीतर सतिनाम हृदय के प्रेम में और बिना समाज या दूसरों की सोच की परवाह किए समस्त विश्व का आलिंगन कर ले। सो उपर्युक्त दिशा निर्देश केवल आरंभकों के लिए हैं ताकि वे भारतीय संस्कृति के कारण अपनी दुविधाओं को पराजित कर सकें।

 

एक आलिंगन करने वाली संत हुए हैं, अम्मा जी, जो कि दक्षिण भारत से हुए हैं। वे सब का आलिंगन करती हैं और सब स्वस्थ हो जाते हैं। इसी लिए दासन दास जी ने कहा कि सतिगुरु जी या माता जी जब हमें आलिंगन प्रदान करते हैं तो वे हमारे दु:ख दूर करते हैं। वे हमारे कष्ट ले लेते हैं और हमें प्रकाश प्रदान करते हैं। परंतु जब तक हम पाँच चोरों (काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार) के अधीन जब आलिंगन करते हैं तो यह मन में पुरुष/महिला वाद-विषय को जन्म देता है। सो आइए हम माया को पराजित करें और हृदय में व्यक्त सतिनाम को विश्व की सेवा करने दें जैसे सतिगुरु जी दूसरों के कष्टों का निवारण करते हैं।

 

  • संत गुर प्रीतो जी

क:

सतिनाम जी, हम एक पाप-स्वीकरण करना चाहते हैं। इस हफ्ते हम सतिनाम सराय में थे और सफाई करने में हाथ बँटा रहे थे, और हमने संगत में गले न मिलने के नए नियम सुने। मुझे इस से वास्तव में ठेस पहुँची (यहाँ ‘मैं’ कह रही हूँ क्योंकि ‘मैं’, ‘मेरा’, ‘मुझे’… इस पहचान को ठेस पहुँची थी, मन माया के द्वारा खेला जा रहा था)। मैं यह स्वीकार नहीं कर पाई कि मैं बाबा जी को या अपने संगत में उन मित्रों, जो पुरुष हैं उन के गले और नहीं लग सकती। मैं यह कठोर नियम स्वीकार नहीं कर सकी जो मेरी स्वतंत्रता को सीमित कर दे। मैं नाराज़ थी क्योंकि मैं सोच रही थी कि यह अकेलापन था और मैंने लिंग पहचान की द्विविधता को महसूस किया और यह मुझे असुविधाजनक बना रहा था। मैंने अपने आप को एक महिला होने पर व्यर्थ महसूस किया क्योंकि मैं बाबा जी के या दासन दास जी के और गले नहीं लग सकती थी। मैं अपने पिता को और आलिंगन नहीं कर सकती थी। मैं सोच रही थी कि संगत में विनोदप्रियता और सौहार्द अब चला जाएगा क्योंकि अब कोई गले नहीं मिलेगा। मैं रोने लग पड़ी। मैंने ककाओ (kakao) छोड़ दिया। मैं सारी रात और दिन चिंतित थी। मैं सब के साथ उत्साह का आनंद नहीं ले पाई। पर आज मुझे यह अनुभव हुआ है कि मैं एक मूर्ख हूं जो ऐसा सोच रही हूं और ईश्वर के हुक्मों पर प्रश्न कर रही हूं। क्योंकि यह माया है और प्रेम भौतिक नहीं होता है। मुझे बाबा जी के गले मिलने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनको याद करने पर ही मेरे हृदय में अति सौहार्द व गर्माहट आ जाती है। हम बाबा जी और दासन दास जी के लिए अत्यधिक प्रेम अनुभव करते हैं जो हमारी आँखों में आँसू ले आता है। और यही है जिसकी हमें आवश्यकता है। हम हृदय से आलिंगन करते हैं जो कि शारीरिक आलिंगन से श्रेष्ठ है। मेरी प्रेम की परिभाषा माया थी। इस परीक्षा के लिए सति पारब्रह्म शुक्राना शुक्राना। धीरे-धीरे आप इस व्यर्थ मूर्ख को सिखा रहे हैं कि प्रेम वास्तव में क्या है? दासन दास जी हम बहुत क्षमायाचक हैं। बाबा जी, माता जी कृप्या इस मूर्ख को क्षमा कर दें। सब कुछ आप का है और आप जैसा कहेंगे हम वैसा करेंगे। हमने पहले कहा था कि हम सदैव आप के सेवक रहेंगे और हम इस सप्ताहांत असफल हुए। कृप्या इस बुद्धिहीन मूर्ख मूढ़ को क्षमा कीजिए।

 

संत गुरप्रीतो जी का उत्तर:

 

सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम

 

केवल देखो आप के भीतर क्या घटित हो रहा है, बाहर केवल एक कहानी है। अंदर से दासन दास जी में अपना विश्वास ना खोएँ। यह केवल आपके लिए एक परीक्षा है। मन का विनाशक पहलू आप को सत्य एवं सत्यवादियों से तोड़ने क यत्न करता है। इसे आलिंगन को करने या न करने से कुछ भी नहीं लेना-देना, यह केवल आपके संदेह को प्रदर्शित करवाने वाला एक घोड़ा या घुण्डी (trigger) है।

 

इसे सतिनाम पर छोड़ दें, जैसे दु:ख दूर करने वाले दासन दास जी के आलिंगनों के बारे में आप को पता है वैसे ही दासन दास जी भी जानते हैं। सो उनके पास अपने कारण हैं। अपना विश्वास न खोएँ। धैर्य रखें और देखें तथा प्रतिक्षा करें की क्या होता है। पृथक रहें। सतिनाम करें।

 

प्रथम गुरु (सतिगुरु नानक पातशाह जी) ने सिख को शव खाने को कहा। दशम (सतिगुरु गोबिंद सिंघ पातशाह जी) ने सिर माँगा, और केवल कुछ ही सफल हुए। समान परीक्षा आप के लिए है। बाबा जी कहते हैं कि हमेशां एक अंतिम परीक्षा होती है जो आप को बनाएगी या तोड़ेगी।

 

विश्वास बंदगी है।

बाकि सब आप पर निर्भर है। सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम। भीतर दाखिल हुए संदेहों को पराजित करने के लिए नित्य दासन दास जी और बाबा जी की प्रशंसा करें।

 

तुम करहु भला हम भलो न जानह

तुम सदा सदा दइआला॥

(पन्ना ६१३)

 

अर्थ: आप हमारे साथ भला करते हो और हम इसे पहचानते नहीं हैं, पर आप सदा-सदा दयावान हैं।

 

हम यह बता चुके हैं कि कई बार जब हमारे सतिगुरुओं के बारे में संदेह आते हैं, तब केवल अपने नकारात्मक मन को पराजित करना है। आगे की कहानी चलने दें, नकारात्मक मन को पराजित करें।

हम आप को कुछ भी साबित नहीं कर सकते, सो हम जो आप को विनती करते हैं वह है हमारा विश्वास करें, ईश्वर को केवल यह कहें कि मुझे समझ नहीं लगती, जैसा चाहे करवाएं। वर्तमान के लिए सर्वश्रेष्ठ करने के लिए सतिगुरुओं की सराहना करें क्योंकि वे बड़ा दृश्य देखते हैं। और देखें एवं प्रतिक्षा करें।

जब भी Ufton (स्थान का नाम) जैसी बड़ी संगत होगी तब संगत की बड़ी परीक्षाएं भी होंगी। सो कहानी या वाद-विवाद में न अटकें, अपने शांत स्थान पर ठहरें जैसे आप आगे ठहरते हैं, और देखें एवं प्रतिक्षा करें, जैसे-जैसे आपका विवेक बढ़ेगा, यह आप को बाद में अनुभूति कराएगा ।

 

ईश्वर आप सब पर कृपा करे कि सब विनम्र और स्नेही बनें।

 

 

संत गुरप्रीतो जी:

 

तो बाहर की कहानी ने आपको दिखाया है कि आपको अभी भी अंदर क्या काम करना है।

 

कुछ भी हमारी शांति को दूर करने में सक्षम नहीं होना चाहिए। क्रॉस पर यीशु, गर्म प्लेट पर पांचवें गुरू।

तो आप खुद से पूछ सकते हैं, “मैंने पहले विश्वास किया और ठेस पहुँची, मैंने तय किया कि वहाँ फिर से वैसे भरोसा नहीं करना” और इस कथन का विश्लेषण करें कि यदि यह सत्य है? क्या वह विश्वास कर रहा था कि यह बुरा था? या यह सिर्फ कर्म था, अगर वह दूसरा व्यक्ति बुरा था और इसका मतलब क्या यह है कि हम फिर से कभी भी भरोसा नहीं करेंगे। लेकिन गुरु पर भरोसा ही है हमारे पास जो हमें सत्य तक पहुंचा सकता है। विश्वास ही बंदगी है।

 

हमारी भी पिछले संत के साथ समान समस्याएं थीं, जिस पर हम पूरी तरह से हृदय से भरोसा करते थे और वे आर्थिक रूप से हमारा फायदा उठाते थे। हमें बाबा जी और दासन दास जी के साथ विश्वास के पुनर्निर्माण के लिए बहुत समय लगा। उन्होंने हमारे साथ कुछ भी गलत नहीं किया, लेकिन हम पिछ्ले संतों की गलतियों को नए संतों के पास ले जा रहे हैं। दासन दास जी ने हमें पहले दिन से ही कहा था कि इस बार यह हमें अधिक समय लगेगा।

 

हर इंसान सिर्फ कर्म ही खेलता है।

 

हम दूसरों से दुखी और खारिज किए जाते हैं, एक बार काटने पर दो बार शर्म आती है, लेकिन फिर हम जीवन से पीछे हट जाते हैं और छिप जाते हैं।

 

तो क्या हम फिर से कभी प्यार नहीं करते, कभी भी पूरी तरह से नहीं जीते हैं और फिर कभी कोशिश नहीं करते हैं?

 

हम एक समान हैं, थोड़े से भी उपेक्षित किए जाने पर ठहर नहीं सकते। चाहे हमारी जवानी के समय विपरीत लिंग द्वारा अस्वीकार किया जाना हो या जब हम नौकरी के साक्षात्कार में असफल रहे हों, या काम पर या स्कूल के दिनों में सामाजिक समारोहों में नजरअंदाज किये गए हों, हमने इससे अपनी सारी ज़िंदगी को प्रभावित किया है।

 

तो विश्लेषण करें अस्वीकार करना क्या है जिसे हम पसंद नहीं करते? भावुक दर्द। प्यार करने योग्य नहीं होना, पसंद नहीं किया जाना, स्वीकृत नहीं किया जाना।

 

कुछ लोग हमारे जैसे वापस चले जाते हैं और आराम में चले जाते हैं: भोजन, टीवी, अन्य शराब पीते हैं, ड्रग लेते हैं या नशे करते हैं आदि।

कुछ लोग प्रतिशोध में लड़ते हैं… ‘ दूसरे मुझे बुरा महसूस करवाने का कैसे यह प्रयास कर सकते हैं, मैं उन्हें दिखाता हूँ!” और दूसरों की भावनाओं की परवाह किए बिना दूसरों को रौंदते चले जाते हैं। और धन व जयचिह्न (ट्रॉफी), महिला मित्र (गर्लफ्रेंड) और बड़े घरों और कारों को इकट्ठा करते हैं क्योंकि इन चीज़ों को अन्य लोगों द्वारा वांछित किया जाता है और इन प्रतिष्ठा के प्रतीकों वाले लोगों को दूसरों द्वारा पसंद किया जाता है। लेकिन मूल कारण क्या है? अहंकार को ठेस पहुँचती हैं और अहंकार ही स्वयं को पसंद और प्यार करवाना चाहता है। फिर से अहंकार!

तो चलो अपने जीवन को फिर से खेलें अगर यहाँ कोई अहंकार न था और हम अनुरागशील स्थान में थे।

और अगर हम स्वीकार करते हैं कि सब कुछ कर्म के अनुसार हुआ, सिर्फ आपके प्रेमी आप के साथ कुछ दिनों के लिए था जिन की संख्या अब खत्म हो गई थी। आपके भूतपूर्व गुरु के साथ लेने और देने की कुछ दिनों की संख्या अब समाप्त हो चुकी है।

 

और उनके काम उनके साथ ही होते हैं, जिनके साथ उन्हें रहना होगा। परन्तु हम प्रेम से कम किसी में भी क्यों रहें, क्योंकि अगर उन्होंने न चुना?

 

क्यों न फिर से पूरे हृदय से बार-बार भरोसा बिना ठेस पहुँचने के भय से करें? यकीन है कि हमें एक व्यक्ति पर भरोसा करने की ज़रूरत नहीं है, जब उसने हमारे विश्वास को धोखा दिया। लेकिन हम अगले व्यक्ति के साथ एक शुद्ध शुरुआत कर सकते हैं और उन में पूरी तरह से भरोसा कर सकते हैं, वे हमें पिछले व्यक्ति की तरह नहीं छोड़ सकते हैं। अलग कर्म हैं।

 

हम वही अज्ञानी व्यक्ति नहीं हैं जो हम वापस ठेस खाकर गेंद में रेंगें और अपने स्वयं (अहंकार के दर्द) की रक्षा करने के लिए वापस चलें जाएं। हमने भरोसा किया, हमने प्रेम किया, हमने अपने आप से कुछ अधिक अनुभव किया, और हाँ हमें अन्य व्यक्तियों के कर्मों के कारण बाद में दर्द मिल गया और हमारे दिमाग ने इसे स्वीकार नहीं किया था। लेकिन हम अब दर्द से डरते नहीं हैं, दर्द हमें भगवान के करीब ले जाता है, हम जानते हैं कि दर्द के साथ क्या करना है। और हम यह भी जानते हैं कि यदि हमारे पास ठेस पाने के लिए कोई अहंकार नहीं है तो कोई दर्द या दुख भी नहीं होगा। तो क्यों न पूरी तरह से जियें, पूरी तरह से भरोसा करें, फिर से भरोसा करने का खतरा उठाएँ, लेकिन दर्द या ठेस के भय के बिना।

 

क्या यह हमारे दिल के चारों ओर की अन्य जंजीरों से मुक्ति नहीं करेगा।

 

इन जंजीरों से मुक्ति, क्या यह मुक्ति नहीं है? क्या यह ऐसा नहीं है कि इसके बाद हम क्या हैं।

 

इसलिए इसके लिए महान विश्वास की आवश्यकता है। और यह विश्वास का उछाल है जो कि केवल हम ही ले सकते हैं और केवल भगवान ही हमारे अंदर देखता है और हमें पकड़ने के लिए तेज़ी से हमारे पास आता है।

 

बाबा जी ने कहा था, “मैं कभी न रहने के स्थान पर प्यार का एक क्षण चखता था।” और यह भी कहा था, “मैं फिर से बारंबार भरोसा करता हूं, चाहे अगर कोई मुझे धोखा देता है, तो भी मैं अगले व्यक्ति को पूरा भरोसा दूँगा।”

 

यह हमारे लिए है कि भरोसा करें, और इसे हमारे अंदर उच्चतम दिव्य गुण के रूप में रखें। गुरु में विश्वास सत्य की ओर ले जाता है, विश्वास बंदगी है। लेकिन हम ऐसे समय में रहते हैं जहाँ कोई भी अब किसी पर और भरोसा नहीं करता है। कई घोटालों ने दिखा दिया है कि राजनेता झूठे हैं, कई पुजारी बालकामुक हैं, कई पुलिस वाले पक्षपाती हैं, कई देश भ्रष्ट हैं। यहां तक ​​कि हमारे अपने परिवारों में भी पति पत्नी पर भरोसा नहीं करते हैं, माता-पिता अपने बच्चों पर भरोसा नहीं करते, हर कोई गुप्त काम करता है। जब हम एक मौका लेते हैं और किसी रिश्ते में अपने दिल के साथ किसी पर भरोसा करते हैं और वे जब हमारे विश्वास को धोखा देते हैं, तो हमें अस्वीकार कर दिया जाता है और फिर हम कभी विश्वास न करने का प्रण ले लेते हैं। हम विश्वास की दिव्य गुणवत्ता को बाहर निकाल देते हैं और फिर हम हृदय के बिना दिमाग से एक एकांतिक जीवन व्यतीत करते हैं। हमें भगवान पर भरोसा करना है और पूरी तरह से जीना है, जो कुछ भी अच्छा या बुरा होता है, लेकिन कम से कम हमने प्रेम किया, हमारे कर्म उच्चतम थे।

जब हम अपने गुरु पर विश्वास करते हैं और सत्य का अपने भीतर एहसास करते हैं, हमारे भीतर गुरु के लिए भी वही प्यार होता है। इसी को बाबा जी प्रेम कहते हैं। लेकिन दूसरा प्रेम मोह कहलाता है क्योंकि उसमें भगवान नहीं हैं। किसी दूसरे में भगवान को न देखना और केवल उसके शरीर, मन और भावनाओं के साथ प्यार करना; इसीलिए वहाँ सब दर्द व दुख हैं। अपने प्रेम को सब के लिए उच्चतम स्तर पर रखें। उसके बाद भगवान का प्यार वापस आपके पास आएगा, दर्द नहीं।

 

सतिनाम सतिनाम सतिनाम जी

 

सति पारब्रह्म महाराज ने उफ्टोन (Ufton) संगत में कहा था, कि नरेन्द्र गरेवाल एक धन्य आत्मा थी और अब वह दरगाह में बैठी है, और पारब्रह्म उसकी देह में बैठा है। सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम सतिनाम. सति पारब्रह्म महाराज जी ने 2010 में कहा था कि उसने अपने गुरुओं और पैगंबरों को भूतकाल में भेजा था, पर इस बार वह स्वयं आया है।

सो आइए उनके वचनों का अपने हृदय में नित्य आलिंगन करें, आइए उनके आध्यात्मिक ज्ञान का अपने मन में नित्य आवरण करें। हमारे भीतर उनके दिव्य प्रकाश के साथ हमारा प्रकाश विलय हो जाए, यह ही आत्मिक आलिंगन है।

 

सभी कनाडा संगत धन्य हैं जो शारीरिक रूप से अब भी सतिगुरु जी और माता जी को गले लगाने में सक्षम है। हम केवल शारीरिक रूप से उन्हें 12 साल में कुछ ही बार मिले हैं। और संगत में दूसरे अभी तक उन्हें शारीरिक रूप से नहीं मिले हैं। हम उन्हें शारीरिक रूप से मिलने के लिए प्रार्थना किया करते थे और यह सच हो गया। उसके बाद कुछ साल पहले प्रार्थना करनी हमने शुरू की, “बाबा जी हम अंदर से आप को जानना चाहते हैं।”   यह तब होगा जब पूर्ण तौर पर हम उन्हें जान जाएंगें, जब हम उन्हें अंदर से गले लगाएंगे।

 

प्रभ कीजै क्रिपा निधान हम हरि गुन गावहगे ॥

हउ तुमरी करउ नित आस प्रभ मोहि कब गलि लावहिगे ॥१॥ रहाउ ॥

(पन्ना १३२१)

आइए हम सभी प्रार्थना करें कि महाराज आएं और हमें अपनी अभ्यंतर गले लगा लें। गुरु राम दास जी प्रार्थना कर रहे हैं, “हे भगवान, आप कृपा का दाता हैं, तो मैं आपकी स्तुति गाऊंगा, कृपया मेरी इस दैनिक आशा को पूरा करें, भगवान आप कब आकर मुझे अपनी छाती से गले लगाएंगे।’

 

सतिगुरु दासन दास जी:

 

अमृत ​​का सच्चा स्रोत सतिगुरु के सति चरण हैं।

जब आप सतिगुरु को दंडवत करते हैं और आप को वे आशीर्वाद देते हैं; यह करने के लिए सबसे अच्छी बात है।

अपने दिमाग में यह हर समय रखें कि सतिगुरु के चरणों पर 1000 सूरजों का प्रकाश है।

गुरूबाणी का पालन करें, सतिगुरु के वचनों का पालन करें, क्योंकि उनके वचन भी सति वचन हैं और दरगाही हुक्म हैं।

आप में से कईओं को सतिगुरुओं, संतों और ब्राह्मज्ञानियों के दर्शन होते हैं, आपको जागरूकता के उस स्तर तक पहुंचने की आवश्यकता है कि जब भी आप को किसी भी महापुरुष के दर्शन हों तो आपको अपने आप को दंडवत में करना चाहिए और उनके चरणों को चूमना चाहिए।

सति सति सति सब पर कृपा करे।

 

संत गुरप्रीतो जी:

इसे स्वचालित बनाने के लिए कि हम अपने सपनों और आत्मिक दृश्यों (visions) में संतों और गुरुओं को दंडवत करें, हमें यह दिन के दौरान भी अभ्यास करने की ज़रूरत है। इसलिए जब हम सतिगुरु जी से ईमेल या ककाओ (Kakao) या फोन पर संदेश प्राप्त करते हैं, तो पहले शारीरिक तौर पर या कम से कम हृदय से उन्हें दंडवत करने अभ्यास कर सकते हैं। फिर संदेश पढ़ें। हमारे द्वारा पढ़े जाते संगत के संदेशों के साथ भी ऐसा करें। पहले उनके चरणों को धोने का अभ्यास करें ताकि हमारे जैसे पापी तर जाएं। फिर अपने परिवार में भी सुबह जूते पोंछने का अभ्यास करें और उन सभी को दंडवत करें। और जब आप बाहर निकलते हैं तो सतिगुरु जी के चरणों के रूप में देखकर हर किसी के पैर धोएं। दिन में इस तरह अपने मन को संतृप्त करके, हमने पाया कि यह आपके स्वप्न/आत्मिक दर्शनों में दंडवत करना स्वचालित हो जाता है।

अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥

नेत्री सतिगुरु पेखणा स्रवणी सुनणा गुर नाउ ॥

सतिगुर सेती रतिआ दरगह पाईऐ ठाउ ॥

कहु नानक किरपा करे जिस नो एह वथु देइ ॥

जग महि उतम काढीअहि विरले केई केइ ॥१॥

(पन्ना ५१७)

अपनी जीभ पर गुरु नाम को कह कर सतिगुरु की सहायता लें। अपनी आंखों के साथ उन्हें देखिए और अपने कानों के साथ गुरु नाम सुनें। जो सतिगुरु के साथ संतृप्त हो जाता है वह भगवान के न्यायालय (दरगाह) में स्थान पाता है। नानक का कहना है कि जो कोई यह उपहार कृपा के साथ प्राप्त करता है वह दुनिया की माया से बच जाता है, वे दुर्लभ हैं।

 

हर किसी में अपने सतिगुरु को देखें, पूरे दिन अपने कानों और दिमाग में सतिनाम को सुनें, सभी को अपने सतिगुरु के रूप में देख कर सेवा करें, और अपने मन में दंडवत करें,  कम से कम संतों की तस्वीरों के आगे। सभी के लिए प्रार्थना करें, सभी को आशीर्वाद दें।

 

सारा दिन ऐसा कीजिए।

 

इस समूह (ककाओ ग्रुप) में सब को इस गुरप्रसादी नाम की कृपा प्राप्त है।

 

अब पूरी तरह से इस के साथ संतृप्त हो जाइए और दरगाह में एक जगह पाइए।

 

तू समरथु वडा मेरी मति थोरी राम ॥

(पन्ना ५४७)

 

अर्थ: आप महान और सर्व-शक्तिशाली हैं; मेरी समझ अपर्याप्त है, हे भगवान!

 

 

सतिगुरु दासन दास जी के वस्त्रों और मर्यादा के बारे में सति वचन

 

सतिनाम संगत मर्यादा के अनुपालन के बारे में क्रमागत हम सतिनाम संगत में पहिनावे के संबंध में कुछ और भी जोड़ना चाहते हैं।

छोटे बच्चों को छोड़कर सब को इस बात पर केन्द्रित करना चाहिए कि सतिनाम संगत के समय अपने पहिनावे को किस प्रकार करना है।

 

सतिनाम संगत के समय जो वस्त्र आप पहनने के लिए चुनते हैं वे शिष्टाचारपूर्वक दिखने चाहिए। चाहे वह रात्रि का समय हो या दिन का आप सब को उचित ढंग से वस्त्र पहनने चाहिए।

 

ख़ास तौर पर युवा लड़कियाँ एवं महिलाओं को हर समय उचित व शिष्ट ढंग से वस्त्र पहनने चाहिए। ढीले तथा अयोग्य वस्त्रों जैसे छोटी पतलून या जांघिया (shorts) की सतिनाम संगत में सख़्ती से मनाही है।

 

महिलाओं के लिए पंजाबी वस्त्रों की हम सराहना करेंगे न कि अनौपचारिक वस्त्रों की जो कि सादे (sober) नहीं लगते।

 

सब को यह समझना चाहिए कि मर्यादा के अनुपालन का सबसे महत्वपूर्ण दृष्टिकोण योग्य वस्त्र पहनना एवं सादे (sober) दिखना है और सतिनाम संगत के दौरान स्वयं के आचार-व्यवहार की चौकसी करना है।

 

हम एक बार फिर से विनती करेंगे कि काले रंग के कपड़ों से बचें क्योंकि ऐसे काले वस्त्र पहन कर आप और नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करेंगे।

 

सतिनाम संगत मर्यादा को तोड़ने का अर्थ दरगाही हुक्म की अवज्ञा है जो कि आप के पतन के लिए ज़िम्मेदार है।

 

आप में से कई आत्मिक प्रगति नहीं कर रहे क्योंकि आप बार-बार दरगाही हुक्म की अवज्ञा करते हैं।

 

सो कृप्या सतिनाम संगत में जाना केवल एक पर्यटन न समझें। इसे गम्भीरता से लें और वहाँ जाने का पूर्ण लाभ प्राप्त करें।

 

साधसंगति असथानु जग मग नूर है ।

(भाई गुरदास जी, वार ३, पउड़ी १०)

 

हम आशा करते हैं कि जब आप सब सतिनाम संगत से लौटें तो आत्मिक अवस्था में और ऊँचे जाएं।

 

और न कि केवल अपने पैर घसीटते जाएं। हम आपके स्वभाव में और मूल्यों में एक उल्लेखनीय परिवर्तन देखना चाहते हैं।

 

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  • सभी लंबे सत्र के लिए सतिनाम सिमरन में जाएं।
  • कृप्या सतिनाम संगत मर्यादा का अपने हृदय एवं आत्मा से अनुपालन करना आरंभ करें।
  • आपका अमृत वेला कम से कम 2.5 घण्टों का रोज़ बिना नागे के होना चाहिए।
  • आप को शाम के समय भी कुछ समय के लिए सिमरन करने पर स्वयं को केन्द्रित करना चाहिए।
  • सतिनाम संगत मर्यादा आप सब की आगे बढ़ने में सहायता करने के लिए है।
  • आप सब को दरगाही हुक्म की सेवा करना सीखना चाहिए और अटकने या अमृत को गंवाने के स्थान पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
  • सतिनाम संगत मर्यादा आप को धन्य बनाएगी और आगे बढ़ाएगी।
  • सब को इसे इसके सही दृष्टिकोण में लेना चाहिए और इसका ध्यानपूर्वक अनुपालन करना चाहिए।
  • जो सतिनाम संगत मर्यादा का पालन नहीं कर सकते हैं वे सतिनाम संगत छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • सतिनाम आप सब पर सदैव कृपा करे।
  • यह पूर्व अवधान उनके लिए है जो सतिनाम संगत मर्यादा से असहमत हैं और इसके पालन से इंकार करते हैं।
  • यह उनके लिए नहीं है जो इसका अनुपालन करने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए गम्भीर हैं।
  • सो कृप्या किसी भी चीज़ से भयभीत न हों।
  • हम आप सब की सतिनाम संगत मर्यादा का अनुकरण करने में हर मार्ग में सहायता करेंगे।
  • इसे केवल पढ़ें, समझें और अपनी आत्मा व हृदय के साथ अमल में लाऐं।
  • आप जब मर्यादा का अनुपालन करेंगे तो आपको सच में प्रतिफल प्राप्त होगा।
  • सतिनाम आप पर सदैव कृपा करे।